Monday, June 8, 2009

संसद में स्वीट डिश...


आधी आबादी का दर्द सीने में पालकर भारत सरकार संसद में महिला आरक्षण बिल पास करवाने की जुगत में है। शरद यादव के बाद अब मुलायम सिंह यादव इसके विरोध में सामने आए हैं। इधर युवा एजेंडे को आगे बढ़ाने में लगी कांग्रेस किसी भी कीमत पर पीछे हटने को तैयार नही है। अब इन बूढे लोगों को क्या पता की महिला आरक्षण के कितने फायदे हैं।

पकिस्तान के नेता प्रतिपक्ष रहे मौलाना फजलुर रहमान महिला आरक्षण का महत्व समझते हैं और महिलाओं से उलझने की कीमत भी वो इसे लेकर काफी विवाद में फँस चुके हैं। ग़लती से एक बार सदन में मौजूद महिलाओ की तुलना स्वीट डिश से कर बैठे। फिर क्या था, जैसे मधु मक्खी के छत्ते में हाथ दे दिया हो। अब भला ये कोई कहने की बात थी। खामख्वाह पन्द्रह दिन तक शोर मचता रहा। वो बात अलग है इस बहने उनको भी रोज़गार मिल गया था वरना मुशर्रफ़ के ज़माने में उनकी दुकान ठंडी पड़ी थी।
मुलायम सिंह का कहना है कि ये क़दम जमे जमाए नेताओं को बेरोजगार कर देगा। वो शायद भूल गए हैं कि अब ज़माना यूथ ब्रिगेड का है। विरोध करने से पहले एक बार अपने बेटे से तो पूछ ही लेते कम से कम फिर मधुमिता शुक्ला और बबीता काण्ड के बाद महिलाएं वैसे भी जाग्रत हो गई हैं। नेता बेचारे भी तो इंसान हैं। अब सोचो सदन में एक भी महिला हो तो? क्या ख़ाक किसी काम में दिल लगेगा आप तो बूढे हो चले हो। बेचारे नौजवानों का दर्द तो समझो। वैसे भी कई कुंवारे हैं सदन में। जो दस बीस पचास जीत कर भी आई हैं वो या तो मौसी हैं या ताई। अब नौजवानों कि तादात के साथ सामंजस्य बिठाना है तो ज़्यादा से ज़्यादा महिलाओं को लाना ही होगा। ज़्यादा आयेंगी तो कुछ नव्युव्तियन भी होंगी ही। आख़िर देश कैसे तो चले।
बहन बना रहे हैं पिछडी महिलाओं का। भाई आपने ही उन्हें क्या दिया? ज़्यादा से ज़्यादा टिकेट बाँट दिए होते तो आज ये दिन देखना ही ना पड़ता। आपने तो कह दिया नेता जी के सिर्फ़ पर कटी ही जीतेंगी। जीतने दो न। जीत जाएंगी तो पर भी ही जाएँगे। वैसे भी बेचारिओं के पर रहने ही कहाँ देते हैं आप लोग। जैसे तैसे घर से निकलती भी हैं तो हर चौराहे पर आप ही के भाई लोग पर काटने छांटने को तत्पर रहते हैं।
इस बार तो नेता जी बाज़ी आप के हाथ से निकल ही गई है। जाने दो। वैसे भी काफ़ी सारे नए रेतिरेमेंट प्लान लॉन्च कर रही है सरकार। कोई एक अपना लो आपका समय निकल गया है। जिनका समय है वो ख़ुद ही जूझ लेंगे इस बीमारी से। वैसे भी घर चलने में तो उनका रिकॉर्ड आपसे तो बेहतर ही है। हो सकता है देश का भी कुछ भला हो जाए।

ओबामा की उलट बंसियां


बुश अंकल आजकल काफ़ी परेशान हैं। पता नही ये ओबामा को क्या हो गया है? जहाँ देखो अनाप शनाप बक आते हैं। एक तो पहले से ही छवि ख़राब थी अब पता नही कहीं मुह दिखाने लायक छोडेंगे भी या नही? अब देखो तो सही, अच्छा खासा मिस्र घूमने गए थे और जाने क्या अनाप शनाप बक आए?
दरअसल नए आए हैं और ऊपर से अमेरिका में बदलाव का नारा दे दिया। भाई बदलना है तो पहले अपने आपको बदलो। एक तो कहीं से अमेरिकी राष्ट्रपति नही लगते। न कोई ताम झाम न कोई दिखावा। बस चप्पल पहन कर निकल लिए। भाई भुट्टे खाओ या बर्गर किसी पर फर्क नही पड़ेगा बस थोड़ा अंत शांत न रहा करो। अपना नही तो आगे आने वालो का ही ख्याल रखो।
अब आपने तो कह दिया कि फिलिस्तीन और इस्राइल आपस में मामला सुलटा लें। ऐसे थोड़े ही न होता है। आपसे पहले वालो ने साठ साल से ज़्यादा मेहनत की, जैसे तैसे जमा जोड़ कर कब्जा किया और आप हैं के बस। आप को क्या मालूम डकैती डालना कितना मुश्किल काम है? पूरा मुल्क कोई ऐसे ही थोड़े बना दिया जाता है। फिर घर पर पूछ कर तो आना चाहए था । आपको चंदा देने वाले बिदक गए तो अगले चुनाव में पार्टी का बेडा और गर्क हो जाएगा।
एक साठ कई लोगो को नाराज़ कर लेना कहाँ की हिमाकत है भला? सेमुएल हटिंगटन ने जैसे तैसे सभ्यताओं मो भिडाने पर पुराण लिखे आप झगडा ही इनकार कर रहे हो? ऐसा कैसे हो सकता है भला? झगडा न होगा तो आपकी अर्थव्यवस्था कैसे चलेगी? पहले से ही दिवालिया हो रहे देश को क्यों डूबना चाहते हो भला?
कहीं ऐसा तो नही कोई नया शिगूफा ढूंढ लाये हो? आपके देश को फ़िर से अल काइदा की ज़रूरत तो नही सताने लगी? उनसे काम लेना है तो धर्म से बेहतर औजार हो ही नही सकता। जब तक पिछला झगडा न सुलटे अगली दोस्ती हो ही नही सकती। वो भी बेचारे आजकल काफ़ी परेशान हैं। अच्छे खासे पाकिस्तान को लपेट लिए होते आपने टांग अड़ा दी। चलो अच्छा ही है। किसी बहाने सही दोस्ती हो तो। इस से आपके देश में रोज़गार बढेगा और दुनिया भर से मंदी भी मिट ही जाएगी। भाई ज़ंग न हो तो आपके हथियार न बिकें। ऐसी हालत में आपका धंधा तो मंदा ही रहेगा। वैसे भी पुराने दोस्त ही आदे वक्त में काम आते हैं।
सब कुछ ठीक ठाक चला तो जल्द ही आपसे किसी नए युद्घ स्थल पर मुलाक़ात होगी। देखते हैं आपके पुँराने दोस्त आपको कितनी तवज्जो देते हैं।

Friday, June 5, 2009

चीन का प्यार , चीनी कि मार


चुगलखोर को समाचार मिला है कि चीनी के दाम अभी और बढ़ेंगे। पहले से ही पच्चीस के पर जा चुकी चीनी का स्वाद कड़वा लग रहा था और अब तो चीनी का नाम सुनकर ही रूह काँप जाती है। चाय पिए अब दिन नही हफ्ते गुज़र जाते हैं। इधर सरकार भरोसा दिला रही है कि चीनी कि मिठास कायम रहेगी।

चीनी और चीन का हम भारतियों के साथ वैसे भी कुत्ते बिल्ली वाला रिश्ता है। आम हिन्दुस्तानी को पहले चीन सताता था, फिर चीनी सामान और अब चीनी। प्राचीन समय से ही भारत चीनी अतिक्रमण से परेशान रहा है। पहले चीन के राजवंश अपनी साम्राज्यवादी आवश्यकताओं कि पूर्ति के लिए यहाँ आते रहे। आधुनिक समय में हमने दोस्ती दुशमनी फ़िल्म कि तर्ज़ पर पहले दोस्ती कि फिर ज़ंग भी लड़ी। फिर से दोस्ती कायम हुई तो दरयादिली दिखाते हुए अपने बाज़ार चीनियों के लिए खोल दिए और ऐसा खोले कि हर तरफ़ चीनियों कि महामाया नज़र आती है। भारत कि कई कंपनियों ने अपना उत्पादन बंद कर चीनी सामान कि मार्केटिंग करने में ही भलाई समझी। चीज़ मेड इन चाइना बस क्वालिटी चेक कि मुहर लगाकर विशुद्ध भारतीय बना दी जाती है। आम हिन्दुस्तानी इस तरह के गोलमाल में कम ही दिलचस्पी लेता है। सो कोई कुछ भी बेच दे बाज़ार अपनी चाल से दौड़ता रहता है।

बात चीनी कि मिठास से शुरू कि गई थी। अब बाज़ार अपनी गति से दौड़ रहा है और चीनी उस से भी तेज़। मगर मांग है कि बस। हर किसी को चीनी चाहिए वो भी हर हाल में। अब वो चाहे खाने पीने में मिठास घोलने वाली चीनी हो या जीवन में मिठास घोलने वाला चीनी सामान। वैसे चुगलखोर ने अपनी तरफ़ से चीनी के बढ़ते दामो के कारण जानने कि काफ़ी कोशिश कि तो कुछ मजेदार बातें भी पता लगीं। अपने कृषि मंत्री देश के कुछ गिने चुने बड़े चीनी मिल मालिकों में से एक हैं। और तो और उनके राज्य में ही सिमटी उनकी पार्टी को चलने में चीनी मिल मालिको का काफ़ी बड़ा योगदान है । फिर तो चीनी के दाम बढ़ने में कोई बुरे नही।

इधर किसान काफी परेशान हैं। उन्हें उम्मीद थी कि चीनी के दाम बढ़ने से उन्हें फायदा होगा मगर ऐसा कुछ हुआ नही। गन्ने के दाम बढ़ना तो दूर पिछला भुगतान भी नही हो पा रहा। चीनी मिल घाटे का रोना अब भी रो रही हैं। यानी यहाँ भी आम आदमी पर चीनी कि मार। चुगलखोर कि भारत सरकार से मांग है कि चीनी मिलो को हो रहे घाटे कि रा तथा सी0बी0आई से जांच कराइ जाए ताकि इसमे चीन कि भूमिका साफ़ हो सके। वैसे देश से जुड़े अन्य मामलो कि तरह कहीं यहाँ भी तो आई0एस0आई का तो हाथ नही। वैसे भी चीनी पाकिस्तानी भाई भाई के अटूट रिश्ते में तो बंधे ही हैं। कम से कम भारत से जुड़े मामलो में तो ये निर्विविवादित सत्य है।

Wednesday, June 3, 2009

चुगली की महत्ता


चुगली लगाना कोई आसान काम नही मगर इस मगर कुछ लोगो को इसमे महारत हासिल है। अब हर कोई तो किसी कला का महारथी नही हो सकता। सो भगवान् नो कुछ खास लोगो को ही इस नेक काम के लिए चुना। इतिहास में सबसे पहले चुगलखोर के तौर पर नारद मुनि का नाम मिलता है। उनके समय में संचार माध्यमों का काफी अकाल था मगर उन्होंने अपनी प्रतिभा के बल पर काफी नाम कमाया।


आधुनिक समय में पत्रकारों को इस कला के प्रचार प्रसार का श्रेय अवश्य ही दिया जाना चाहिए। बेचारे सुबह से लेकर शाम तक दिन रात एक किए रहते हैं । इस कार्य में उनकी पारंगता निश्चय ही उनके अनुभव पर निर्भर करती है।


चुगलखोरी की कला का सबसे बेहतर प्रयोग आधुनिक समय में राजनेता कर रहे हैं। प्राचीन दरबारी भी इसके लोक्महत्व से परिचित थे मगर उस समय में यह भांडगिरी से ज़्यादा आगे तक नही जा पाई। वैसे हर समय में अपने दुश्मन को ठिकाने लगाने के लिए चुगलखोरी का उपयोग आवश्यकता अनुसार किया जाता रहा है। आधुनिक राजनीति में आन दा रिकार्ड तथा आफ दी रिकार्ड जैसे शब्दों का प्रचलन काफी बढ़ा है। एक शातिर पत्रकार तथा चुगलखोरी की कला में पारंगत विद्वान् अपने हुनर के बल पर काफी नाम कमा सकता है। आफ दी रिकॉर्ड सुचना देने में हमारे नेताओं का कोई सानी नही। बस कोई उगलवाने वाला हो। उनकी इस कला से देश की तरक्की तथा हेराफेरी से कितना परदा उठता है यह शोध का विषय हो सकता है। बहरहाल आप साथ देते रहिये। यकीनन हम इस कला को नई बुलंदिया ही नही प्रदान करेंगे बल्कि नए नए आयाम भी तलाशेंगे। तो लगे रहिये और नई नई चुगलियाँ गढ़ने में मेरी सहायता कीजिये।

चुगलखोरी के फायदे


झूठ और सच के साथ चुगलखोरी का अनूठा रिश्ता है। एक चुगलखोर को अमूमन झूठा साबित करने की कोशिशें लगातार की जाती हैं मगर असलियत यही है की चुगलखोर से ज़्यादा सच कोई बोलता भी नही। एक चुगली लगाने में कितनी मशक्क़त करनी पड़ती है, इस बात को इस जालिम ज़माने में कम ही लोग समझते हैं।

भाई पीठ पीछे कोई बात कहने से झूट थोड़े न हो जाती है। अब आप कुछ कारेंगे ही नही तो आपकी चुगली कोई कैसे लगा देगा भला? एक चुगलखोर कितनी मुसीबतें उठाकर और बात खुलने पर पिटने का खतरा उठाकर इतनी जनसेवा करता है। अगर वो काम न करे तो जाने कितनी बातें यूँ ही दफन हो जाएं और हमें उन पर परिचर्चा का अवसर ही न मिले।

चुगलखोरी का एक लाभ और भी है। इस कार्य को निरंतर करने से पेट साफ़ रहता है और पेट में दर्द की शिकायत कभी नही होती। चिकित्सक इस पद्धति का उपयोग कर धन एवं यश लाभ अर्जित कर सकता है। बाबा रामदेव भी इस अछूती रह गई विधा पर अतिरिक्त शोध कर देश विदेश में इसे प्रसिद्ध कर सकते हैं। बहरहाल हमे शोध और लाभ में ज़्यादा दिलचस्पी नही है। मैतो बस इतना ही चाहता हूँ के चिटठा जगत से जुड़े लोग आकर मेरे कार्य मै हाथ बटाएं ताकि mai aap ki सेवा और बेहतर ढंग से कर सकूं।